Psychology Of Overthinking

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What is Overthinking

Psychology of Overthinking: ओवरथिंकिंग कैसे आपके दिमाग और शरीर को प्रभावित करती है?

आज के समय में अगर सबसे तेजी से बढ़ने वाली मानसिक समस्याओं की बात की जाए, तो उनमें ओवरथिंकिंग सबसे ऊपर दिखाई देती है। कोविड-19 के बाद मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) को लेकर जागरूकता बढ़ी है और लोगों ने महसूस किया है कि वे जरूरत से ज्यादा सोचने की आदत से जूझ रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर ओवरथिंकिंग होती क्यों है? क्या यह सिर्फ ज्यादा सोचने का नाम है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण भी है? और सबसे महत्वपूर्ण बात, इसका हमारे शरीर और जीवन पर क्या असर पड़ता है?

ओवरथिंकिंग के पीछे का विज्ञान

न्यूरोसाइंस के अनुसार हमारा दिमाग कई अलग-अलग हिस्सों से मिलकर बना है, लेकिन काम करने के तरीके को समझने के लिए इसे दो प्रमुख नेटवर्क में बांटा जा सकता है।

1. Task Positive Network (TPN)

जब हम किसी काम पर ध्यान केंद्रित करते हैं, निर्णय लेते हैं, समस्याओं का समाधान करते हैं या कोई लक्ष्य पूरा करने की कोशिश करते हैं, तब हमारा दिमाग TPN मोड में काम करता है।

इस अवस्था में:

  • फोकस बढ़ता है।
  • निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है।
  • काम पूरा करने की प्रेरणा मिलती है।
  • बाहरी दुनिया पर ध्यान केंद्रित रहता है।

2. Default Mode Network (DMN)

जब हम किसी विशेष काम में व्यस्त नहीं होते और हमारा मन इधर-उधर भटकता है, तब DMN सक्रिय हो जाता है।

इस दौरान हम:

  • पुरानी यादों में खो जाते हैं।
  • भविष्य की कल्पनाएं करते हैं।
  • खुद का विश्लेषण करते रहते हैं।
  • डे-ड्रीमिंग करते हैं।

DMN अपने आप में बुरा नहीं है। यह रचनात्मक सोच और आत्म-चिंतन के लिए जरूरी है। समस्या तब शुरू होती है जब यह जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाता है।

ओवरथिंकिंग कैसे शुरू होती है?

जब कोई व्यक्ति लगातार खुद का विश्लेषण करता रहता है, अतीत की घटनाओं को दोहराता रहता है और भविष्य को लेकर चिंतित रहता है, तब DMN धीरे-धीरे हाइपरएक्टिव हो जाता है।

यहीं से शुरू होता है Overthinking Loop।

पहला चरण: "Why Me?" Loop

व्यक्ति सोचने लगता है:

  • मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?
  • लोग मुझे क्यों नहीं समझते?
  • मैं ही बार-बार असफल क्यों होता हूं?
  • मेरी जिंदगी में ही इतनी समस्याएं क्यों हैं?

यही ओवरथिंकिंग का शुरुआती बिंदु होता है।

दूसरा चरण: Future Worry Trap

इसके बाद दिमाग भविष्य की चिंताओं में फंस जाता है।

जैसे:

  • अगर मैं ऐसा ही रहा तो क्या होगा?
  • मेरा करियर खराब हो गया तो?
  • अगर लोग मुझे छोड़ दें तो?
  • अगर मैं असफल हो गया तो?

इन सवालों के जवाब नहीं होते, लेकिन दिमाग उन्हें बार-बार दोहराता रहता है।

तीसरा चरण: Sticky Thoughts Trap

यह सबसे खतरनाक चरण होता है।

यहां कुछ नकारात्मक विचार हमारे दिमाग से चिपक जाते हैं।

व्यक्ति चाहे जितनी कोशिश करे, वही विचार बार-बार लौटकर आते हैं।

उदाहरण:

  • किसी की कही हुई बात
  • कोई पुरानी गलती
  • कोई असफलता
  • कोई शर्मनाक अनुभव

और फिर दिमाग दोबारा "Why Me?" वाले चक्र में लौट जाता है।

Victim Mentality कैसे विकसित होती है?

लगातार ओवरथिंकिंग करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे खुद को पीड़ित (Victim) मानने लगता है।

भले ही किसी समस्या में उसकी खुद की भी गलती रही हो, लेकिन उसका दिमाग ऐसे कारण खोजने लगता है जिससे वह खुद को निर्दोष साबित कर सके।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि यदि वह अपनी गलती स्वीकार कर लेगा, तो उसे समाधान की दिशा में कदम उठाने पड़ेंगे। इसके लिए TPN सक्रिय करना होगा, जबकि DMN लगातार सक्रिय रहना चाहता है।

परिणामस्वरूप व्यक्ति एक मानसिक लूप में फंस जाता है।

ओवरथिंकिंग का शरीर पर प्रभाव

लगातार ओवरथिंकिंग सिर्फ दिमाग को नहीं बल्कि पूरे शरीर को प्रभावित करती है।

1. Cortisol बढ़ जाता है

कॉर्टिसोल को Stress Hormone कहा जाता है।

जब हम तनाव में होते हैं, तब शरीर कॉर्टिसोल रिलीज करता है।

ओवरथिंकर्स में यह हार्मोन लंबे समय तक ऊंचा बना रह सकता है।

2. नींद प्रभावित होती है

रात को सोते समय:

  • पुरानी बातें याद आना
  • भविष्य की चिंता करना
  • दिमाग का लगातार सक्रिय रहना

ये सभी अनिद्रा (Insomnia) का कारण बन सकते हैं।

3. Anxiety बढ़ती है

दिमाग हर स्थिति में सबसे बुरे परिणाम की कल्पना करने लगता है।

छोटी समस्याएं भी बड़ी दिखाई देने लगती हैं।

4. आत्मविश्वास कम हो जाता है

लगातार खुद की आलोचना करने से आत्मविश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाता है।

व्यक्ति हर निर्णय पर संदेह करने लगता है।

क्या आप ओवरथिंकर हैं?

यदि निम्नलिखित बातें आपके साथ अक्सर होती हैं, तो संभव है कि आप ओवरथिंकिंग से प्रभावित हों:

  • पुरानी बातचीत बार-बार याद आती है।
  • सोते समय दिमाग बंद नहीं होता।
  • छोटे-छोटे निर्णय लेने में परेशानी होती है।
  • हर स्थिति में सबसे बुरा परिणाम सोचते हैं।
  • लोगों की बातों में छिपे हुए नकारात्मक अर्थ खोजते हैं।
  • भविष्य की चिंता लगातार बनी रहती है।
  • पुरानी गलतियों को भूल नहीं पाते।

इन संकेतों की संख्या जितनी अधिक होगी, ओवरथिंकिंग की संभावना भी उतनी अधिक होगी।

ओवरथिंकिंग से बाहर कैसे निकलें?

ओवरथिंकिंग का सबसे प्रभावी उपाय है अपने दिमाग को DMN से निकालकर TPN में लाना।

इसके लिए:

  • किसी काम में व्यस्त रहें।
  • नियमित व्यायाम करें।
  • जर्नलिंग करें।
  • ध्यान (Meditation) का अभ्यास करें।
  • स्क्रीन टाइम कम करें।
  • समस्या के बारे में सोचने के बजाय समाधान पर काम करें।

याद रखिए, सोचने और ओवरथिंकिंग में बहुत बड़ा अंतर है। सोचने से समाधान निकलता है, जबकि ओवरथिंकिंग हमें उसी जगह बार-बार घुमाती रहती है।

निष्कर्ष

ओवरथिंकिंग सिर्फ एक आदत नहीं बल्कि दिमाग के काम करने के तरीके से जुड़ी हुई प्रक्रिया है। जब हमारा Default Mode Network जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाता है, तब हम अतीत, भविष्य और स्वयं के बारे में लगातार सोचते रहते हैं। धीरे-धीरे यह एक मानसिक लूप बन जाता है जो तनाव, चिंता, अनिद्रा और आत्मविश्वास की कमी का कारण बनता है।

इसलिए जब भी आपको लगे कि आपका दिमाग बार-बार एक ही विचारों में उलझ रहा है, तो खुद को किसी सार्थक कार्य में लगाइए। क्योंकि ओवरथिंकिंग का सबसे अच्छा इलाज है—सोचते रहने के बजाय कार्रवाई करना जरूरी है, कुछ करते रहोगे दिल दिमाग सुस्त रहेगा। Hindi Jnk 


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