What is NFCP?(महामारी का दर्दनाक दौर)
साल 2020 भारत के इतिहास का वह दौर जिसे शायद आने वाली पीढ़ियां भी एक दर्दनाक अध्याय के रूप में याद रखेंग। सड़कों पर सन्नाटा था लेकिन अस्पतालों के बाहर चीख थी। कहीं ऑक्सीजन के लिए लोग भटक रहे थे। कहीं अस्पताल के दरवाजे बंद हो रहे थे। टीवी स्क्रीन पर लगातार एक ही दृश्य दिखाई। एंबुलेंस की आवाज, श्मशानों में लंबी कतारें और बेबस इंसान और परी। कोविड महामारी ने सिर्फ एक वायरस का संकट पैदा नहीं किया था। इसने हमारे हेल्थ केयर सिस्टम की कमजोरियों, प्रशासन की तैयारियों और शासन की जवाबदेही की बखिया भी उघेल दी और कई कठोर सवाल खड़े कर दी।
इसी अंधकार के बीच में आती है एक उम्मीद की किरण, और वह है Vaccine। देश में बड़े पैमाने पर टीकाकरण का अभियान शुरू। लाखों नहीं करोड़ों भारतीयों ने विश्वास के साथ अपनी बाहें आगे बढ़ाई। यह मान करके कि यह कदम ना केवल उनकी बल्कि पूरे समाज की रक्षा करेगा। लेकिन हर कहानी उतनी आसान नहीं। कुछ मामलों में Vaccine लेने के बाद उसके गंभीर दुष्परिणाम आना शुरू हो गए और कुछ परिवारों ने अपने अजीज सदस्यों क्या उन परिवारों को न्याय पाने के लिए अदालतों में सालों तक यह साबित करना पड़ेगा कि किसी ने गलती की थी?
बक्या राज्य केवल नागरिकों से कर्तव्य की अपेक्षा कर सकता है? क्या उसे उनके संकट में सहभागी भी बनना पड़ेगा? यही प्रश्न अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और वहीं से शुरू हुई एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस जिसका नतीजा है डो फॉल्ट वैक्सीनेशन कंपनसेशन पॉलिसी जिस पर आज हम लोग डिस्कशन करेंगे इस Blog पर। जो पिटिशनर उनका तर्क क्या है? सरकार का पक्ष क्या है? सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर क्या-क्या महत्वपूर्ण टिप्पणियां की है?
टोल्ड लबिलिटी का सिद्धांत क्या है? इसको लेकर के कॉन्स्टिट्यूशनल बेसिस उसका क्या है? 2022 में इससे संबंधित कुछ निर्णय आए थे वो क्या है? और अभी कोर्ट ने क्या निर्देश तो मामले के बैकग्राउंड को अगर समझेंगे तो उसके पहले हम लोग आ जाते हैं नवीनतम जो लेटेस्ट डेवलपमेंट है वो क्या है? तो लेटेस्ट डेवलपमेंट तो यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में जिसका नाम है रचना गंगू वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया। इसमें सिर्फ रचना गंगू जी नहीं बल्कि तमाम ऐसे लोग जिन्होंने अपने पिटीशन दायर दायर कर रखे थे सुप्रीम कोर्ट में उन सबको मिलाकर के एक मामला सुप्रीम कोर्ट ने सुना और उस पर अभी सुनवाई करते हुए कोविड के वैक्सीन के कारण जिन लोगों को नुकसान हुआ जिन लोगों की मृत्यु हुई है उनको नो फौल्ट मुआवजा नीति देने के बनाने का निर्देश दिया है केंद्र की सरकार को।
What is No-Fault Compensation Policy (NFCP)?
अब नो फौल्ट कंपनसेशन पॉलिसी क्या होता है? देखिए, नो फौल्ट कंपनसेशन पॉलिसी एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें अगर कोई दुर्घटना या नुकसान हो जाता है, तो उसमें किसी का एकाउंटेबिलिटी उसका दायित्व निर्धारित करने की उसमें आवश्यकता नहीं होती। बस मान लिया जाता है कि, दुर्घटना हुआ है ना। अब कुछ साबित करने के लिए मत बोलो।
जैसे कि मोटर व्हीकल एक्सीडेंट के मामले में यह नियम है कि आप रोड पार कर रहे हैं। गाड़ी ने आपको धक्का मार दिया। अब ये मत देखो कि गाड़ी वाले की गलती थी या रोड पार करने वाले की गलती थी। एक्सीडेंट हुआ तो जो कंपनसेशन का रूल है आप दो। उसी तरीके से इस मामले में भी केविन कोविड वैक्सीन से जो भी दुष्परिणाम आया है उसके मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की सरकार को निर्देश दिया है कि, आप भी एक कंपनसेशन पॉलिसी बनाओ और वो नो फौल्ट के आधार पर होनी चाहिए। ठीक है?
Case Background: Rachana Gangu vs Union of India
अब मामले की पृष्ठभूमि वही बात है कि रचना गंगू जी और उनके साथ कई परिवारों ने एक याचिका याचिका दायर की थी। जिनमें इनके परिजन 18 से 40 वर्ष के थे और दुर्लभ जटिलताओं के कारण जब उन्होंने अह वैक्सीन लिया। चाहे वह कोविड शील्ड हो या फिर आपका कोवैक्सीन हो। यही दो पॉपुलर थे।
जैसे blood clotting उनका होने लगा। तो इन सब चीजों के कारण तो उनको समस्याएं आई। किसी ने जान गवा दिया। किसी को गंभीर जटिल स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो गई। उसी पर सुनवाई करते हुए ये खबर सामने आई है और आप भी मैं मानता हूं। हालांकि मैं इस मामले में खुद को लकी मान रहा हूं कि मैंने एक भी वैक्सीन लिया नहीं है। लेकिन अधिकांश लोगों ने जिसमें मेरे परिवार के सदस्य भी शामिल है। कोविड शील्ड या कोवैक्सीन को अपनाया ही था।
Petitioners’ Arguments
हुआ क्या है? देखिए याचिकाकर्ता जो पिटिशनर है रचना गंगू जी और उनके साथ तमाम लोग और उनके वकील उनका तर्क क्या है?
देखिए पहला है कि सूचित सहमति इनफॉर्म कंसेंट का अभाव था। मतलब वैक्सीन आ गया तब उसको दनादन दनादन लगाना शुरू कर दिया गया और उसकी क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं? उसको लेने का क्या रिस्क हो सकता है? इसके संबंध में कोई विशिष्ट जानकारी नहीं पहुंचाई गई।
हालांकि कहने के लिए सरकार कह रही है कि वह तो इंजेक्शन वैक्सीन लेना ज़रूरी था। लेकिन आप देखें यह थ्योरेटिकली तो बात सही है कि भाई ठीक है आप स्वेच्छा से चाहे तो ले सकते हैं। नहीं चाहे तो नहीं लेकिन प्रैक्टिकली उस समय ऐसे एडमिनिस्ट्रेटिव सिचुएशन क्रिएट कर दिए गए थे कि आपको लेना ही पड़ा।
नहीं तो आपको ट्रेन से यात्रा करना है नहीं कर पाएंगे। हवाई यात्रा करना है नहीं कर पाएंगे। यूनिवर्सिटी कॉलेज जाना है नहीं जा पाएंगे। बिना जब तक आपके पास वैक्सीनेशन का सर्टिफिकेट ना हो। कहीं भी एक तरीके से लोग मजबूर तो हुए ही प्रैक्टिकली व्यवहारिक तौर पर ठीक ना कि भाई आपको लगवाना ही पड़ेगा और इसके जोखिम को लेकर के कोई भी जो है पर्याप्त जानकारी लोगों तक नहीं पहुंचे।
दूसरा इनका पॉइंट है कि टीकाकरण वही जो मैंने बोला कि व्यवहारिक रूप से अपार था। अगर कोई भी इस बात को कहता है कि देखिए यह तो अपेक्षित था। आप चाहे तो लो चाहे तो ना लो। लेकिन व्यवहार में यह चीज़ें थी कि हां यह जबरदस्ती की। एक तरीके से फोर्स किया गया लोगों को कि आपको लेना ही पड़ेगा और इसका नतीजा क्या है? यह हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है।
क्यों? स्वस्थ स्वास्थ्य और जीवन का अधिकार। ये क्या है? हमारा फंडामेंटल राइट है। आप हमें एक ऐसा वैक्सीन लगा रहे हो। हम मान लेते हैं कि भाई ठीक है चलो खुद ही जाकर के लगवा रहे हैं तो आप ऐसी वैक्सीन लगा रहे हो जिसके दुष्परिणाम को लेकर के हमारी आपने हमको पूरी जानकारी सफिशिएंट जानकारी हमको नहीं दी है और इसके कारण मेरे स्वास्थ्य पर अगर कोई गंभीर संकट उत्पन्न होता है मेरे जानने वाले के स्वास्थ्य पर गंभीर संकट उत्पन्न होता है उनकी जान खतरे में पड़ती है तो ये उनके जीवन और स्वास्थ्य के साथ पढ़े तो यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
Government’s Argument
ठीक है? अब सरकार का इसमें क्या पक्ष है कि भाई सरकार का पक्ष है कि वैक्सीन को जो है ना तमाम वैज्ञानिक और नियामकीय मंजूरियां मिली थी।
अब सरकार क्या कह रही है कि चलो अगर हो भी गया एडवर्स इंपैक्ट ना तो जो नियम पहले से बना है वो जाकर के फॉलो करो। क्या नियम है कि अगर आपको नुकसान हुआ है तो आप जाइए आप कंज्यूमर कोर्ट में केस कीजिए। आप जाइए सिविल कोर्ट में केस कीजिए। वहां पर सालों तक केस लड़ते रहिए। अगर केस जीत जाएंगे केस लड़ते-लड़ते अगर आप खुद भी जिंदा रहेंगे।अब मुआवजा लेने की हालत में रहेंगे तो हम विचार करेंगे। आइएगा ले लीजिए।
Supreme Court Observations
अब इसी चीज को लेकर के सुप्रीम कोर्ट ने कुछ तल्ख टिप्पणियां की है कि, नागरिकों पर अत्यधिक बोझ मत डालो।
वैक्सीन से जुड़े मामलों में लापरवाही सिद्ध करना वैज्ञानिक रूप जटिल होता है। कैसे एक आम आदमी सिद्ध करेगा कि अगर मेरे परिवार मेरे परिवार का या मेरा ही वैक्सीन लेने के बाद से अगर हालत मेरी खराब हो गई शारीरिक में बीमार हो गया है या किसी की डेथ हो गई है। एक आम आदमी कैसे जाकर के सिद्ध करेगा कि किसी और स्वास्थ्य कारण से नहीं हुआ। सरकार के वकील तो पढ़े लिखा आएंगे। आम आदमी कैसे जाकर के सिद्ध करेगा?
No-Fault Liability Principle
यहीं से आता है नो फोल्ड लियाबिलिटी का सिद्धांत। इस सिद्धांत के अनुसार क्या है? जो मैंने शुरू में ही आप लोग को बताया कि पीड़ितों को बिना लापरवाही स्थित किए मुआवजा दिया जाता है।
भारत में पहले से प्रचलित है। जैसे कि अगर रोड एक्सीडेंट आपका हो जाता है तो वहां पर आपको मिलता है।
और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो देश हैं जैसे आपका ऑस्ट्रेलिया हो गया, यूके हो गया, जापान हो गया वहां पर वैक्सीन मुआवजा योजना मतलब वैक्सीन के कारण जो चीजें उल्टा-पुल्टा होता है। कंपनसेशन से रिलेटेड पॉलिसी है।
Constitutional Basis (Article 21)
और इसका संवैधानिक आधार क्या है जो शुरू में मैंने आप लोगों को समझाया कि अगर मुझे कोई ऐसा वैक्सीन मैंने लिया या मुझे लेने के लिए डायरेक्टली इनडायरेक्टली फोर्स किया गया जिसके कारण मेरे स्वास्थ्य को नुकसान हुआ है।
मेरा जीवन खतरे में पड़ा है तो मेरा अनुच्छेद 21 इसका वो उल्लंघन है और जो स्वास्थ्य और गरिमा का अधिकार है एक इसके अंदर वो भी शामिल है।
2022 Supreme Court Case
2022 का भी एक मामला है जो जेकब पुलियल का वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया में।
इसमें सुप्रीम कोर्ट ने वैक्सीन अनुमोदन की प्रक्रिया वो मतलब साफ-साफ कहा था कि चलिए आपकी प्रक्रिया में थी लेकिन उसमें भी फिर ₹00 कंपनसेट कंपनसेशन देने का ऑर्डर सुप्रीम कोर्ट ने दिया था।
Latest Supreme Court Direction
पर अभी का जो निर्देश है वही सिंपल सा है कि मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर को कहा गया है कि जल्द से जल्द कोविड 19 टीकाकरण से जुड़े गंभीर प्रतिकूल प्रभाव के लिए नो फौल्ट वो आप मुआवजा नीति तैयार करें।
और सिंपल सा है कि इंपॉर्टेंट बात क्या है कि यह मुआवजा सरकार की गलती स्वीकार करने का समान नहीं माना जाएगा।
सरकार को भी यहां पर नहीं दिया गया है कि भाई चलिए अगर आप कंपनसे लोगों को देना शुरू करते हैं तो यह नहीं माना जाएगा कि आप कंपनसेट तब कर रहे हैं जब आपने कुछ नुकसान किया है। आपको हम दोषी नहीं मान रहे हैं।
जो हो चुका है हो चुका है। कोर्ट का कहना बिल्कुल सही।
अब आप दीजिए। किसी को सिद्ध करने के लिए मत बोलिए। किसी को कोर्ट जाने के लिए कोर्ट ऐसा मत बोलिए। आप कोई नई कमेटी मत बनाइए। कुछ मत कीजिए।
जो कह रही है सुप्रीम कोर्ट उसको फॉलो कर लीजिए।
Disclaimer:
यह लेख केवल शैक्षिक और जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों, न्यायालय के निर्णयों और नीति चर्चाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, वैक्सीन या सरकारी नीति के बारे में गलत जानकारी फैलाना नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी निर्णय के लिए कृपया योग्य चिकित्सक या आधिकारिक स्वास्थ्य प्राधिकरण की सलाह अवश्य लें।
