Gerrymandering और मुसलमानों की सियासी नुमाइंदगी
हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है, जहाँ हर पाँच साल में चुनाव होते हैं और करोड़ों लोग अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं। लोकतंत्र की इस व्यवस्था को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक चुनाव कहा जाता है। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या यह व्यवस्था वास्तव में सभी समुदायों को बराबर राजनीतिक प्रतिनिधित्व देती है, खासकर मुसलमानों को?
मुसलमानों की सियासी नुमाइंदगी का सवाल लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। देश की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 14 प्रतिशत है, लेकिन संसद में उनका प्रतिनिधित्व इससे बहुत कम है। यह अंतर केवल संयोग नहीं बल्कि कई राजनीतिक और चुनावी प्रक्रियाओं का परिणाम माना जाता है।
हाल ही में मध्यप्रदेश के कटनी जिले में एक घटना सामने आई जिसमें 167 नाबालिग बच्चों को, जो मदरसे की पढ़ाई के लिए जा रहे थे, गलत सूचना के आधार पर पुलिस ने मानव तस्करी के मामले में हिरासत में ले लिया। 13 दिनों तक बच्चों को रोके रखने के बाद उन्हें रिहा किया गया। यह घटना प्रशासनिक व्यवस्था और अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति व्यवहार पर गंभीर सवाल उठाती है। साथ ही यह भी स्पष्ट करती है कि प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर जवाबदेही का अभाव किस प्रकार समुदायों के विश्वास को कमजोर करता है।
लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व
भारत की लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं, लेकिन इनमें से केवल 24 सांसद मुसलमान हैं। यानी जहाँ देश की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 14.2% है, वहीं लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व लगभग 4.4% ही है।
स्थिति और गंभीर तब दिखती है जब केंद्र सरकार की मंत्रिपरिषद पर नजर डाली जाए, जहाँ एक भी मुस्लिम प्रतिनिधि मौजूद नहीं है। यह आँकड़ा दर्शाता है कि राजनीतिक भागीदारी के मामले में मुसलमानों की उपस्थिति बेहद सीमित है।
2024 के आम चुनाव में भी यह असमानता साफ दिखाई दी। एनडीए गठबंधन ने पूरे देश में केवल 2 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया। वहीं विपक्षी गठबंधन ने 78 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जो आबादी के अनुपात से बहुत कम थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि अधिकांश राजनीतिक दल मुस्लिम प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता नहीं देते।
ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व
मुसलमानों की कम राजनीतिक भागीदारी कोई नई बात नहीं है। 1952 के पहले आम चुनाव से लेकर आज तक लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की संख्या हमेशा उनकी आबादी के अनुपात से कम रही है।
1980 और 1984 के चुनावों में मुस्लिम प्रतिनिधित्व कुछ बढ़ा था, लेकिन यह वृद्धि अस्थायी रही। बाद के चुनावों में यह संख्या फिर कम हो गई। यही पैटर्न राज्य विधानसभा चुनावों में भी दिखाई देता है। इसका मतलब यह है कि यह समस्या किसी एक चुनाव या सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनावी ढाँचे और राजनीतिक रणनीतियों से जुड़ी हुई है।
कम प्रतिनिधित्व की मुख्य वजहें
1. राजनीतिक दलों द्वारा कम टिकट देना
राजनीतिक दल अक्सर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने से बचते हैं। इसके पीछे यह सोच रहती है कि मुस्लिम उम्मीदवार उतारने से गैर-मुस्लिम वोटरों का समर्थन कम हो सकता है। यही कारण है कि आबादी में बड़ी हिस्सेदारी होने के बावजूद मुसलमानों को टिकट कम मिलते हैं।
2. वोटों का बँटवारा
जहाँ मुस्लिम उम्मीदवार खड़े होते भी हैं, वहाँ कई बार एक ही सीट पर कई मुस्लिम उम्मीदवार होने से वोट बँट जाते हैं। इससे किसी एक उम्मीदवार की जीत की संभावना कम हो जाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनावों में यह स्थिति कई बार देखी गई है।
3. फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम
भारत में चुनाव प्रणाली ऐसी है जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीत जाता है, चाहे उसे कुल वोटों का आधे से कम समर्थन मिला हो। इस व्यवस्था में यदि किसी समुदाय की आबादी किसी सीट पर बिखरी हुई हो, तो उसका प्रभाव कम हो जाता है। मुसलमानों के साथ यही स्थिति अक्सर देखने को मिलती है।
4. आरक्षित सीटें
कई ऐसे निर्वाचन क्षेत्र जहाँ मुस्लिम आबादी अच्छी-खासी है, उन्हें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कर दिया जाता है। इससे मुस्लिम उम्मीदवार वहाँ चुनाव नहीं लड़ सकते। इससे भी उनका राजनीतिक प्रभाव कम हो जाता है।
5. भौगोलिक वितरण
मुसलमानों की आबादी देशभर में फैली हुई है, लेकिन अधिकतर क्षेत्रों में वे अल्पसंख्यक हैं। बहुत कम ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जहाँ उनकी संख्या निर्णायक हो। यही वजह है कि बड़ी आबादी होने के बावजूद उनका प्रतिनिधित्व सीमित रह जाता है।
Delimitation का असल मतलब
Delimitation का असल मतलब होता है सीमाओं का निर्धारण करना, यानी किसी क्षेत्र, अधिकार या दायरे को साफ़-साफ़ तय करना। यह शब्द आमतौर पर राजनीति, प्रशासन और भूगोल में इस्तेमाल होता है।
राजनीतिक संदर्भ में, Delimitation का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल चुनाव क्षेत्रों (constituencies) की सीमाएं तय करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, जब किसी देश में जनसंख्या बढ़ती या घटती है, तो चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय किया जाता है ताकि हर क्षेत्र में लगभग बराबर जनसंख्या हो और सभी लोगों को समान प्रतिनिधित्व मिल सके। भारत में यह काम एक विशेष संस्था करती है जिसे कहा जाता है।
Delimitation का मुख्य उद्देश्य होता है न्याय और समानता बनाए रखना। अगर किसी क्षेत्र की जनसंख्या बहुत ज़्यादा हो जाए और उसके पास प्रतिनिधि कम हों, तो वहां के लोगों की आवाज़ कमजोर हो जाती है। इसी समस्या को ठीक करने के लिए समय-समय पर सीमाओं को बदला जाता है।
यह प्रक्रिया आमतौर पर जनगणना (Census) के आंकड़ों के आधार पर होती है। जैसे के आंकड़ों के अनुसार यह तय किया जाता है कि किस क्षेत्र की आबादी कितनी है और उसके अनुसार सीटों का बंटवारा किया जाता है।
Delimitation केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उपयोग अन्य क्षेत्रों में भी होता है, जैसे भूमि सीमांकन (land demarcation), प्रशासनिक क्षेत्रों का निर्धारण, या किसी प्रोजेक्ट की सीमा तय करना। हर जगह इसका उद्देश्य होता है—किसी चीज़ की स्पष्ट सीमा तय करना ताकि भ्रम या विवाद न हो।
हालांकि, कभी-कभी Delimitation विवादों का कारण भी बन जाता है, खासकर जब सीमाओं का निर्धारण निष्पक्ष तरीके से नहीं किया जाता। इसे कुछ देशों में “gerrymandering” से भी जोड़ा जाता है, जहां राजनीतिक लाभ के लिए सीमाओं को जानबूझकर बदला जाता है।
संक्षेप में, Delimitation एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो लोकतंत्र को मजबूत बनाने, समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने और प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित रखने में अहम भूमिका निभाती है।
Delimitation और राजनीतिक सीमाएँ
भारत में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ डीलिमिटेशन कमीशन तय करता है। इसका काम यह तय करना होता है कि कौन-सा क्षेत्र किस संसदीय सीट का हिस्सा होगा। सिद्धांत रूप से यह प्रक्रिया जनसंख्या के आधार पर निष्पक्ष होनी चाहिए, लेकिन कई बार इस प्रक्रिया के जरिए राजनीतिक प्रभाव को बदला जा सकता है।
लोकसभा की 543 सीटों की सीमाएँ समय-समय पर पुनर्निर्धारित की जाती हैं। संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार हर जनगणना के बाद डीलिमिटेशन की प्रक्रिया हो सकती है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य बराबर जनसंख्या वाले निर्वाचन क्षेत्र बनाना है।
लेकिन जब किसी समुदाय की आबादी को अलग-अलग क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है, तो उसकी राजनीतिक ताकत कम हो जाती है। यही स्थिति कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में देखी जाती है।
Gerrymandering क्या है?
जब निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ इस तरह बदली जाती हैं कि किसी खास समुदाय या राजनीतिक दल को फायदा या नुकसान हो, तो इसे Gerrymandering कहा जाता है।
यह एक राजनीतिक रणनीति है, जिसके जरिए वोटों के प्रभाव को कम या ज्यादा किया जाता है। इसके मुख्य तरीके हैं:
Cracking – किसी समुदाय के वोटरों को कई क्षेत्रों में बाँट देना ताकि उनका प्रभाव कम हो जाए।
Packing – किसी समुदाय के वोटरों को एक ही क्षेत्र में केंद्रित कर देना ताकि बाकी क्षेत्रों में उनका असर खत्म हो जाए।
Stacking – निर्वाचन क्षेत्र में ऐसे समूहों को मिलाना जिससे किसी विशेष वोट बैंक का प्रभाव कमजोर हो जाए।
मुस्लिम क्षेत्रों में Gerrymandering का असर
देश में लगभग 60 ऐसे जिले हैं जहाँ मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत से ज्यादा है। लेकिन संसदीय नक्शे में केवल लगभग 40 ऐसी सीटें हैं जहाँ मुस्लिम वोटर 30 प्रतिशत से ऊपर हैं।
इन 40 सीटों में से भी कई सीटें एससी या एसटी के लिए आरक्षित हैं। इसका मतलब यह है कि वास्तविक रूप से बहुत कम सीटें बचती हैं जहाँ मुस्लिम वोट राजनीतिक रूप से निर्णायक हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, बिहार के पूर्णिया जिले में मुस्लिम आबादी लगभग 38 प्रतिशत है, लेकिन सीमाओं के पुनर्निर्धारण के बाद मुस्लिम वोटरों का प्रभाव कम कर दिया गया। ऐसे उदाहरण उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम में भी देखने को मिलते हैं।
निष्कर्ष
भारत में मुसलमानों की राजनीतिक नुमाइंदगी उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम है। इसके पीछे कई कारण हैं—राजनीतिक दलों की रणनीति, चुनाव प्रणाली, आरक्षित सीटें, भौगोलिक वितरण और डीलिमिटेशन की प्रक्रिया।
Gerrymandering जैसी प्रक्रियाएँ मुस्लिम वोटों के प्रभाव को और कम कर देती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि संसद और सरकार में उनकी भागीदारी सीमित रह जाती है।
यदि लोकतंत्र को वास्तव में प्रतिनिधिक बनाना है, तो चुनावी सीमाओं और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर गंभीर पुनर्विचार आवश्यक है। समान राजनीतिक भागीदारी के बिना लोकतंत्र की गुणवत्ता अधूरी रहती है।