Rizwanur Rahman Case: अरबपति की बेटी से शादी के बाद रहस्यमयी मौत की पूरी कहानी

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Love Story जो जान ले गई
Image Source: instagram @desicrime

     Love Story जो जान ले गई

      21 सितंबर 2007 सुबह का वक्त और कोलकाता में दमदम और विधान नगर रोड रेलवे स्टेशन के बीच पटरी पर एक लाश पड़ी मिलती है। बॉडी को काफी संभाल कर रखा गया है। दोनों हाथ सीने पर तय कर दिए गए हैं और ऐसा लग रहा है जैसे मानो कोई सो रहा हो। लेकिन सिर के पीछे गहरी चोट है। शरीर पर 10 जगह जख्म है। ट्रेन ड्राइवर जो वहां से गुजर रहा है, उसने लाश देखी है। उसे इतना तो कंफर्म है कि उसकी ट्रेन ने इस आदमी को नहीं मारा। तो आखिर ये चोटें उसकी शरीर पे आई कैसे? अब जो आदमी उस पटरी पर पड़ा है, उसका नाम है रिजवान उर रहमान। उम्र करीब 30 साल। कोलकाता में एक मल्टीमीडिया सेंटर में ग्राफिक डिजाइन सिखाता है। उसकी मौत कैसे हुई? किसी ने कहा मर्डर है तो किसी ने कहा सुसाइड है। लेकिन सच तो यह है कि उसकी मौत की जिम्मेदार थी उसकी मोहब्बत। उसने मोहब्बत की फिर शादी की लेकिन कई लोगों को यह मोहब्बत नागवार गुजरी और यह प्रेम ही उसका गुनाह बन गया जिसने उसकी जान ली। 

 यह प्रेम कहानी कैसे शुरू हुई

      रिजवान उर रहमान कोलकाता के पार्क सर्कस इलाके में रहता था। एक मिडिल क्लास मुस्लिम परिवार पिता का साया बचपन में ही उठ गया था तो मां केश्वर जहां ने बच्चों को पाला। रिजवान उर रहमान ने सेंट जेवियस से पढ़ाई की। अच्छी अंग्रेजी थी और इसके बाद ग्राफिक डिजाइन की पढ़ाई की। फिर एक मल्टीमीडिया ट्रेनिंग सेंटर में उसे नौकरी मिल गई। वो वहां ग्राफिक डिजाइनिंग सिखाता था। जिंदगी आगे बढ़ रही थी। फिर उसके ट्रेनिंग सेंटर में एक लड़की आती है। नाम प्रियंका उम्र 23 साल। अब प्रियंका कोई आम लड़की नहीं थी। क्यों? क्योंकि वह बेटी थी अशोक तोड़ी की। अशोक तोड़ी यानी LUX industries के मालिक। 
   
   वही लक्स को अंडरवियर ब्रांड वाले कोलकाता के बड़े कारोबारी बड़ा बंगला, बड़ा रसूख और बड़े ताल्लुकात। रिजवान उर रहमान और प्रियंका को ग्राफिक डिजाइन सिखा रहा था। इस बीच दोनों की बातचीत होने लगती है और बातों में दोस्ती हो गई और फिर यह दोस्ती मोहब्बत की शक्ल ले लेती है। घर वालों को तो कुछ पता नहीं था। दोनों अलग-अलग दुनिया से थे और सबसे बड़ी बात अलग-अलग धर्म से। एक तरफ पार्क सर्कल्स का छोटा सा किराए का मकान वहीं दूसरी तरफ अशोक तोड़ी की हवेली। दोनों तय कर लेते हैं कि वह अब साथ रहेंगे, शादी करेंगे और यह फैसला रिज़वान उर रहमान की जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला था और शायद आखिरी भी। 18 अगस्त 2007 को दोनों स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी कर लेते हैं। यह वो कानून है जो बिना धर्म बदले बिना किसी रस्म के दो एडल्ट लोगों को शादी करने की परमिशन देता है। शादी में रिज़वान उर के कुछ करीबी दोस्त और साथी गवाह के रूप में मौजूद थे। दोनों के घर वालों को कुछ नहीं बताया गया। शादी के बाद प्रियंका वापस अपने घर चली गई और रिज़वान उर अपने काम पर जैसे कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन यह बात ज्यादा दिन छुप नहीं सकती थी और अगस्त के आखिर में रिज़वान उर रहमान ने अपने बड़े भाई रुकबान उर रहमान को सब बता दिया।

प्यार का असल खिचड़ी अब शुरू हुई

     31 अगस्त को वो प्रियंका को अपने घर ले आया। पार्क सर्कस का छोटा सा अपार्टमेंट वर्किंग क्लास मोहल्ला और और उसी दिन दोनों पुलिस को चिट्ठी लिखते हैं। उस लेटर में लिखा कि कुछ अपराधी तत्व हमारे घर आकर हमें धमका रहे हैं। कह रहे हैं कि अगर हम साथ रहे तो हमको इसकी सजा भुगतनी पड़ेगी। दोनों ने पुलिस से सिक्योरिटी मांगी और जवाब में पुलिस ने जो किया वह तो हम बाद में बताएंगे। पहले यह जानिए कि अशोक तोड़ी ने जब यह सुना कि उनकी बेटी उस लड़के के घर पर है तो उन्होंने क्या किया? 

   न्यूज़ रिपोर्ट्स के मुताबिक अशोक तोड़ी कुछ रिश्तेदारों को लेकर रिज़वान उर रहमान के उस छोटे से घर में पहुंचते हैं। वो आदमी जिसके पास करोड़ों की दौलत थी, जिसके पास दुनियां का ऐसों आराम था, ताल्लुकात थे, वो घर आता है और घुटनों के बल बैठ जाता है। बेटी के पांव पकड़ कर कहता है कि मेरी नाक कट जाएगी। प्लीज मेरी इज्जत बचा ले। इसके बाद वो कहते हैं मैं किसी मुसलमान को अपना दामाद नहीं बना सकता। किसी भी सूरत में नहीं। एक बाप का यह बयान किसी भी सभ्य समाज में शर्मनाक होना चाहिए था। लेकिन कोलकाता में 2007 में यह बयान देने वाले के साथ पुलिस थी। रिज़वान उर रहमान के पास क्या था? अंधा कानून पर का भरोसा और कागज पर दर्ज एक शादी और उम्मीद कि शायद यह जो व्यवस्था है, यह जो सिस्टम है, उसका साथ देगी, उसके साथ खड़ी रहेगी। अब अशोक तोड़ी पुलिस में शिकायत दर्ज करवा देते हैं। शिकायत में वह लिखवाते हैं कि प्रियंका को धोखे से उठाया गया है और जबरन रोका गया है। अब सोचिए दो एडल्ट लोग कानूनी तरीके से शादी करके रह रहे हैं। स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत यह शादी रजिस्टर्ड है और फिर भी पुलिस में शिकायत। अब शिकायत के बाद जो पुलिस ने किया वो इस कहानी का सबसे काला अध्याय है। 

डीसीपी अजय कुमार का दबंगिरी 

   डीसीपी अजय कुमार दोनों को बुलाते हैं और रिज़वान उर रहमान को सीधी धमकी देते हैं। कहते हैं कि अगर वह गिरफ्तार नहीं होना चाहता है तो एक हफ्ते के लिए प्रियंका को उसके पिता के घर भेज दे। यहां तक कि यह भी कहा गया कि अगर प्रियंका रिज़वान उर रहमान के घर रहती है तो उस पर अपहरण और गैरकानूनी हिरासत के आरोप लगाए जाएंगे। एक मामूली सी चोरी का इल्जाम लगाने की भी बात कही गई कि रिज़वान उर रहमान ने तोड़ी हवेली से फोन और कुछ सामान चुराया है। जिस पुलिस को उनकी रक्षा करनी थी अब वही पुलिस उनके खिलाफ खड़ी थी। यह वो पुलिस थी जिसने खुद एक चिट्ठी का जवाब नहीं दिया लेकिन अशोक तोड़ी की शिकायत पर तुरंत हरकत में आ गई।

पुलिस हेड क्वार्टर्स में मीटिंग 

 अब 8 सितंबर 2007 को लाल बाजार पुलिस हेड क्वार्टर्स में एक मीटिंग होती है। जहां रिजवान उर को बुलाया जाता है और पुलिस का यह तर्क था कि प्रियंका अपने मां-बाप से ठीक से बात नहीं कर पाती क्योंकि रिजवान उर हमेशा पास होता है। पुलिस का कहना था कि प्रियंका को एक हफ्ते के लिए अपने मां-बाप के पास जाने दो ताकि वह खुलकर बात कर सके। 

     लेकिन रिज़वान उर रहमान को यह मंजूर नहीं था। वो बहुत देर तक मना करता रहा और आखिरकार वो राजी हुआ। लेकिन एक शर्त पर लिखित में मिले कि प्रियंका वापस आएगी। अब प्रियंका के मामा अनिल सराओगी वहां मौजूद थे। उन्होंने एक सादे कागज पर साइन किया। पुलिस की गवाही भी थी उसमें कि 15 सितंबर को प्रियंका रिजवानोर के घर वापस लौट जाएगी। अब उसी दिन 8 सितंबर को प्रियंका अपने मां-बाप के घर चली जाती है। रिज़वान उर रहमान के हाथ में एक कागज था। एक उम्मीद थी लेकिन जाने से पहले प्रियंका को यह खबर दी गई कि पापा बीमार हैं। अब प्रियंका जैसे ही घर पहुंची घर वालों ने उसका मोबाइल छीन लिया। उसे दूर भेज दिया।


प्रियंका का गुहार और रिज़वान का इंतजार

     लेकिन किसी तरह उसे एक मौका मिला और प्रियंका ने चुपके से रिजवान उर को फोन किया और फोन के उस तरफ रिज़वान उर रहमान था। इस तरफ प्रियंका रोने लगी। उधर रिजवान उर रो रहा था। प्रियंका ने कहा कि मेरा इंतजार करना प्लीज मुझे भूलना मत। चाहे महीनों लग जाए, चाहे साल लग जाए लेकिन तुम मुझे भूलना मत। और इस तरफ रिजवान उूर ने वादा किया कि मैं पूरी जिंदगी तुम्हारा इंतजार करूंगा। और यह आखिरी बार था जब दोनों ने एक दूसरे की आवाज सुनी। वो फिर कभी नहीं मिल पाए। 11 सितंबर 2007 को अपने परिवार के साथ एक बार बात हुई। उसके बाद रिज़वान उर रहमान ने कई बार फोन किए। फिर 15 सितंबर को जब उसने फोन किया तो प्रियंका के घर वालों ने उसे प्रियंका से बात नहीं करने दी। 


रिज़वान उर रहमान की बेजुबान चिट्ठी  

        7 दिन बीत चुके थे और यह करार था लेकिन प्रियंका वापस नहीं आई। 18 सितंबर को एक और झटका लगा। रिज़वान उर रहमान की शादी का एक गवाह था। उसे पुलिस ने धमकाया और पुलिस ने कहा कि उसे गिरफ्तार किया जाएगा क्योंकि इल्जाम यह है कि उसने प्रियंका को जबरन शादी के लिए मजबूर किया है। 19 सितंबर को रिजवानर ने एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स यानी एपीडीआर नाम की एक संस्था को चिट्ठी लिखी। उसने लिखा कि मैं भारत का एक संजीदा और ईमानदार नागरिक हूं। मैंने हमेशा संविधान की इज्जत की है और एक वयस्क होने के नाते हमने कानून के रास्ते जाकर एक दूसरे से शादी की। प्लीज मुझे मेरी बीवी से मिलवाने में मदद कीजिए। एक आदमी जो कानून में यकीन रखता है, वह कानून से मदद मांग रहा है। 

पुलिस हमेशा ऐसे मामलों में दखल देती रहती है और देती रहेगी 

     लेकिन उससे पहले एक और खबर आई। उसने एक चिट्ठी में यह भी लिखा था कि वह हिंदू धर्म अपनाने को तैयार है। बस एक शांतिपूर्ण शादीशुदा जिंदगी चाहिए। सोचिए उस इंसान की मनोस्थिति और वह चिट्ठी भेजने के दो दिन बाद 21 सितंबर 2007 की दोपहर रिज़वान उर रहमान की लाश मिलती है। दमदम और विधान नगर रोड स्टेशन के बीच रेलवे ट्रैक पर दोनों हाथ सीने पर रखे हुए एकदम साफ सुथरे कपड़े सिर के पीछे गहरी चोट और शरीर पर कुछ घाव।

     ट्रेन ड्राइवर वो इंसान था जिसने सबसे पहले यह लाश देखी। उसने बाद में बयान दिया कि उसकी ट्रेन ने रिज़वान उर रहमान को नहीं मारा। पोस्टमार्टम नील रतन सरकार हॉस्पिटल में प्रोफेसर एस बताब्याल ने किया। रिपोर्ट में यह निकला कि मौत चोटों की वजह से हुई जो शायद किसी धीमी चलती ट्रेन से लगी हो। लेकिन फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स ने उसी पोस्टमार्टम रिपोर्ट और प्रोसेस पर सवाल उठा दिए। कोई फोटोग्राफिक डॉक्यूमेंट नहीं था इस पूरे प्रोसेस में। एक मौत जिसमें कई सारे सवाल थे उसका पोस्टमार्टम बिना किसी फोटोग्राफिक रिकॉर्ड के कैसे हो गया?

    उसी दिन रिजवान उूर के भाई रुकबान नूर रहमान ने कराया पुलिस स्टेशन में एक लिखित शिकायत दर्ज करवाई जिसमें अशोक टोड़ी पर अपने भाई की हत्या का शक जताया। लाश मिली नहीं थी कि कोलकाता पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर प्रसून मुखर्जी सामने आ गए। उन्होंने रिज़वान उर रहमान की मौत को सिंपल केस ऑफ सुसाइड करार दिया। उन्होंने यह भी कहा कि बड़े लोगों के घर से भागकर शादी करना नैतिक रूप से गलत है और इसलिए पुलिस हमेशा ऐसे मामलों में दखल देती रहती है और देती रहेगी। उन्होंने यह कहा कि 23 साल तक मां-बाप ने प्रियंका को पाला, उनकी देखभाल की और एक सुबह अगर परिवार को यह पता लगता है कि उनकी बेटी घर छोड़कर किसी अनजान लड़के के साथ जिंदगी बसर करने चली गई है तो मां-बाप को यह मंजूर नहीं हो सकता। 

 अशोक तोड़ी-स्नेहशीष गांगुली-प्रसून मुखर्जी इन सब में कनेक्शन 

     और जब पत्रकार उनसे सवाल पूछते हैं कि क्या यह सब लीगल है? जबकि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला है कि कानूनी अंतरधार्मिक शादी की पुलिस को रक्षा करनी चाहिए। तो फिर मुखर्जी का बयान आता है कि इफ द पुलिस डस नॉट इंटरफेयर इन दीज़ फैमिली मैटर्स, हु विल डू इट? पीडब्ल्यूडी? इतना कहकर वो गुस्से में इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से उठकर चले गए। सोचिए किस लेवल पर बंगाल पुलिस उस वक्त ऑपरेट कर रही थी। अब समझिए इस गठजोड़ को जो इस पूरे मामले की जड़ थी। प्रसून मुखर्जी सिर्फ पुलिस कमिश्नर नहीं थे। वह क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल के प्रेसिडेंट भी थे। और वह भी यह पद इन्हें बिना किसी मुकाबले के मिला था। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के सक्रिय समर्थन से। आरोप था कि अशोक तोड़ी ने इस पद के लिए मुखर्जी की फंडिंग भी की थी। और इस पूरे जाल में अब एक और नाम सामने था। स्नेहशीष गांगुली। क्रिकेटर सौरव गांगुली के बड़े भाई अशोक तोड़ी से उनकी अच्छी पहचान बताई जाती थी। कहा जाता था कि स्नेहशीष की मदद से अशोक तोड़ी का पुलिस के आला अधिकारियों से गहरा रिलेशन था। मीडिया जांच में यह भी सामने आया कि मुखर्जी रिज़वान उर रहमान की शादी के कुछ दिनों बाद ही अशोक तोड़ी के भाई से मिले थे। और तभी इन्होंने इस जोड़े को अलग करवाने में मदद करने का भरोसा दिया था। अब बात आती है उन एसएमएस की। रिज़वान उर रहमान की मौत के करीब एक महीने बाद जब जनता का गुस्सा पुलिस के खिलाफ चरम पर था तब अचानक कुछ एसएमएस सामने आए। 

    यह एसएमएस किसी अननोन सोर्स से सरकार के कुछ करीबी मीडिया हाउसेस को मिलते हैं। पहला एसएमएस अशोक तोड़ी को भेजा गया था। पापा मैं 10 मिनट में खुद को खत्म कर लूंगा। प्लीज मुझे आखिरी बार बात करने दीजिए। टाइम स्टैंप था 21 सितंबर सुबह 9:24फिर दूसरा एसएमएस विमला तोड़ी को मम्मी मैं 5 मिनट में खुद को मार दूंगा। प्लीज मुझे उससे बात करने दीजिए। इसका टाइम स्टैंप 9:30 ये दोनों एसएमएस हिंदी में थे। रिज़वान उर रहमान के भाई और करीबी दोस्तों ने कहा कि रिज़वान उर रहमान सेंट जेवियस का पढ़ा हुआ था। वो हमेशा अंग्रेजी में एसएमएस करता था। हिंदी में एसएमएस करने का तो कोई रिकॉर्ड ही नहीं था। अब एक और बड़ा सवाल। भारत में किसी के प्राइवेट एसएमएस बिना कोर्ट आदेश के बिना आपराधिक संदिग्ध बनाए नहीं निकाले जा सकते।

      कुछ अपने भी बेगाने निकले

      अब रिज़वान उर रहमान पर कोई आपराधिक मामला था ही नहीं तो यह किसने और किसके कहने पर एसएमएस मोबाइल कंपनी से निकलवा लिए और वो कैसे किसी अननोन सोर्सेस से मीडिया तक पहुंच गए? इसका जवाब तो कभी नहीं आया। अब आता है पैसे का खेल। सीबीआई की जांच में एक नाम बार-बार सामने आया। सैयद मुहुुद्दीन उर्फ पप्पू रहमान परिवार का सबसे पुराना जानने वाला। पप्पू ने सीबीआई के सामने यह एक्सेप्ट किया कि एक डील हुई थी रिज़वान उर रहमान और प्रियंका की शादी तुड़वाने के लिए। पप्पू ने बताया कि उसने प्रियंका के चाचा प्रदीप तोड़ी से पैसे लिए हैं। फिर 13 सितंबर को ₹5 लाख लिए और 19 सितंबर को ₹ लाख लिए। यानी कुल 11 लाख। यह शब्द टेलीग्राफ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा। पप्पू ने यह भी कहा कि इस रकम का एक हिस्सा उसने रुकबान उर रहमान को भी दिया। यानी रिज़वान उर रहमान के सगे बड़े भाई को। अब रहमान परिवार ने पैसे लेने वाली बात से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि एक ब्लैंक चेक जरूर आया था लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया था। 

     इधर 22 सितंबर 2007 को कोलकाता के पार्क सर्कस और तिलजाला इलाके में आग लग गई। बिनिया पुकुर, टोपसिया, टांगड़ा और कड़ाया थाना इलाकों में अफवाह फैल गई कि रिज़वान उर रहमान का शव पुलिस मुर्दा घर से गायब हो गया है और करीब 300 लोगों की भीड़ ने सड़क जाम कर दिया। पुलिस की गाड़ियां जलाई और आठ बसें तक फूंक दी। पुलिसकर्मियों पर पथराव हुआ और 17 पुलिसकर्मी घायल हो गए। और 24 लोग भी घायल हुए। ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स को तैनात करने के बाद यह दंगा काबू किया गया। इधर मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य जब रिजवान के परिवार से मिलने जा रहे थे तभी भीड़ ने उनकी कार पर भी हमला कर दिया। 

    16 अक्टूबर 2007 को कोलकाता हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाया। राज्य सरकार की जांच को गैरकानूनी करार दिया और सीबीआई जांच के आदेश दिए। 17 अक्टूबर को मुख्यमंत्री भट्टाचार्य ने पांच संदिग्ध पुलिस अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से ट्रांसफर करने की घोषणा की। जिसमें पुलिस कमिश्नर प्रसून मुखर्जी, डिपुटी कमिश्नर ज्ञानवंत सिंह और अजय कुमार शामिल थे। सीपीआईएम पॉलिट ब्यूरो की सदस्य वृंदा करात कहती हैं, पश्चिम बंगाल में मौजूद प्रोग्रेसिव कल्चर के तहत रिज़वान उर रहमान की मौत के मामले में कुछ पुलिस ऑफिसर्स का तबादला किया गया था। हम रिज़वान उर रहमान के परिवार के साथ खड़े हैं और दोषियों के खिलाफ न्याय और सख्त कारवाई की मांग करते हैं। इधर ज्योति बसू ने कहा कि हां जिन पुलिसकर्मियों पर रिज़वान उर रहमान पर दबाव डालने के आरोप थे उनका तबादला करने में देरी से राज्य सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा है और इसका पॉलिटिकल नुकसान हमें भी उठाना पड़ा है। इधर ममता बनर्जी एक रैली में कहती हैं कि रिज़वान उर रहमान की मौत को 23 दिन हो चुके हैं। आज ईद का पवित्र दिन है और हम लोगों को ईद की मुबारकबाद देने निकले हैं। लेकिन इस इलाके में साफ वजहों से कोई ईद नहीं मना रहा है। मामले में ना अब तक कोई गिरफ्तारी हुई है और ना ही जांच में कुछ खास प्रोग्रेस। अहंकारी मुख्यमंत्री अभी भी यह सोच रहे हैं क्या उनके लिए मारे गए बेटे की मां से मिलने जाना सही होगा या नहीं। 

     3 नवंबर 2007 को एक शख्स इंद्रनील घोष एक टीवी चैनल पर आया। उसने दावा किया कि उसने रिज़वान उर रहमान को उठाकर ले जाते हुए देखा था। सीबीआई को पहले गुमनाम चिट्ठी भी आई थी जिसमें अपहरण का दावा था। सीबीआई ने फिर घोष से पूछताछ की और कहानी में कई सारी कमियां निकली। फिर सीबीआई ने निष्कर्ष निकाला कि अपहरण का कोई ठोस सबूत है ही नहीं। और 6 नवंबर 2007 को प्रियंका ने अपने वकील के जरिए रिज़वान उर रहमान की मां किश्वर जहां को एक चिट्ठी भेजी। चिट्ठी में लिखा था कि प्रियंका तोड़ी अब रिज़वान उर रहमान के घर नहीं आएंगी। वो अपने पिता अशोक तोड़ी के घर पर ही रहेंगी और इस घटना से वह भी उतने सदमे में हैं जितना रिज़वान उर रहमान का परिवार है। प्लीज उनका सारा सामान वापस कर दिया जाए जिसमें साड़ियां, ग्रीटिंग कार्ड्स, पर्सनल डायरी, पिक्चर्स, फोटो, जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल के सर्टिफिकेट और कई सारी पर्सनल चीजें शामिल हैं। किश्वर जहां ने इस चिट्ठी को घाव पर नमक छिड़कने जैसा बताया। 

      उन्होंने जवाब में लिखा कि आपको खुद आकर उस मां से मिलना चाहिए जिसने अपने बेटे को इन्फ्लुएंशियल पुलिस अधिकारियों और आपके पिता की साजिश के वजह से खो दिया है। यह बेहद दुख की बात है कि आपने यह चिट्ठी अपने वकील के जरिए भेजी। मुझे उम्मीद है कि आप खुद आकर अपना सामान लेंगी और यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि मुझे यह चीजें अपनी बहू की जगह किसी वकील या चपरासी या क्लर्क को देनी पड़े और मेरा तो आपसे कोई कानूनी विवाद भी नहीं है। उधर अशोक तोड़ी ने हाई कोर्ट में हलफनामा दिया। उन्होंने दावा किया कि प्रियंका और रिवानुर की शादी हुई ही नहीं थी।

      उन पर लगे इल्जामों को भी उन्होंने खारिज कर दिया और कहा कि पुलिस के साथ उनका कोई कनेक्शन नहीं था। लाल बाजार थाने में दंपत्ति पर दबाव बनाए जाने की बात उन्हें मालूम ही नहीं थी। प्रियंका ने भी एक महिला आयोग प्रतिनिधि मंडल से कहा कि देयर वर नो पुलिस प्रेशर ऑन मी एंड नो पुलिस ऑफिसर एल ट्रीटेड मी। उन्होंने अपने परिवार पर कोई इल्जाम ही नहीं लगाया। बल्कि रिज़वान उर रहमान के भाई रुकमा नूर और पप्पू पर उंगली उठाई। उनका कहना था कि इन दोनों ने उसके और उसके परिवार के बारे में बहुत झूठ बोला है। सीबीआई फरवरी 2008 में जांच पूरी करके चार्जशीट दाखिल कर देती है। निष्कर्ष सुसाइड का था। लेकिन अबेटमेंट टू सुसाइड यानी आत्महत्या के लिए उकसाने का केस बनाया। आरोपी थे अशोक तोड़ी प्रदीप तोड़ी अनिल सराहोगी पूर्व डिपुटी कमिश्नर अजय कुमार एसीपी सुकांत चक्रवर्ती सब इंस्पेक्टर कृष्णेंदु दास और पप्पू यानी सैयद मोहयुद्दीन सीबीआई ने यह भी सिफारिश की कि पूर्व कमिश्नर प्रसून मुखर्जी के खिलाफ डिपार्टमेंटल इंक्वायरी हो और पूर्व डीसी ज्ञानवन सिंह के खिलाफ प्रशासनिक कारवाई। 

     13 अक्टूबर 2008 को सुप्रीम कोर्ट ने सारी कार्यवाही रोक दी जब तक कि कोलकाता हाईकोर्ट अशोक तोड़ी की याचिका पर फैसला ना कर ले। मई 2010 में कोलकाता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सीबीआई को आदेश दिया कि रुकबानूर की शिकायत को एफआईआर मानकर मर्डर केस दर्ज किया जाए। फिर अशोक तोड़ी सुप्रीम कोर्ट गए। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में उस हाई कोर्ट ऑर्डर की जांच की और उसी साल अप्रैल 2011 में कोलकाता की सेशंस कोर्ट ने अबेडमेंट टू सुसाइड के चार्जेस फॉर्मली फ्रेम कर दिए। अशोक तोड़ी परिवार ने चार्जेस क्वैश करने की कोशिश की। जून 2017 मेंक हाईकोर्ट ने उनकी पिटीशन खारिज कर दी। चार्जेस बरकरार रहे। अब हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट चले गए।

  कहानी में एक और ट्विस्ट है अरिंदम मनन्ना

   फिर अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी अपील डिसमिस कर दी और ट्रायल को आगे बढ़ाने की इजाजत दे दी। इधर जनवरी 2009 में ही सभी आरोपी बेल पर बाहर आ चुके थे और अभी फरवरी 2026 तक बेल पर ही हैं। ट्रायल्स चल रहे हैं और करीब 19 साल बाद भी किशोर जहां इंतजार कर रही हैं। लेकिन इस कहानी में एक और ट्विस्ट है अरिंदम मनन्ना। गवर्नमेंट रेलवे पुलिस के सब इंस्पेक्टर। रिजवानूर की लाश पटरी पर मिली थी और इसलिए मामला सबसे पहले रेलवे पुलिस के पास आया था। अरिंदम इस केस के पहले इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर थे। सीबीआई की चार्जशीट में उनका नाम गवाह के तौर पर था। लेकिन 11 फरवरी 2009 को रिज़वान उर रहमान👇 की मौत के करीब डेढ़ साल बाद अरिंदम मनन्ना👆 की लाश भी एक रेलवे पटरी के पास मिली। उनकी काम की जगह से काफी दूर। अगले ही महीने उनकी शादी भी होने वाली थी और उनके शरीर की हालत तो ऐसी थी कि देखना मुश्किल था। सिर धड़ से अलग, हाथ टूटे हुए, बाई पसली के नीचे गहरा जख्म और दाई आंख निकली हुई। उनके पिता चाय की टपरी चलाते थे। उनकी मां मालती ने कहा कि तोड़ी परिवार उनके बेटे पर लगातार दबाव डाल रहा थाअरिंदम मनन्ना के भाई देव प्रसाद मोहित्रा ने बयान दिया कि अरिंदम के पास दो मोबाइल फोन थे। एक में Vodafone और दूसरे में Airtel का कनेक्शन था। पुलिस को मोबाइल फोन तो मिल गए लेकिन सिम कार्ड गायब थे। अब सबूत मिटाने के लिए सिम कार्ड जानबूझकर निकाले गए हैं। अरिंदम के हाथ पैर टूटे हुए थे और उसकी आंख बाहर की ओर निकली हुई थी। ऐसा किसी आत्महत्या में तो नहीं हो सकता। यह हत्या है और हम दोषियों को सजा दिलाने की मांग करते हैं। अरिंदम मनन्ना की मौत की जांच सीआईडी को सौंपी गई मगर कुछ खास नहीं हुआ। सालों बाद भी इन दोनों मौतों के बीच एक लिंक साबित हो नहीं पाया है। 

     सीपीआईएम के राज्य सचिव शोमेन ने एक बयान में कहा कि रिज़वान उर रहमान की हत्या इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने एक हिंदू लड़की से प्यार करने और बाद में उससे शादी करने की हिम्मत की। प्रशासन के सख्त और मनमाने रवैया के खिलाफ जनता के गुस्से की वजह से मुख्यमंत्री अब कोलकाता पुलिस के दोषी अधिकारियों को बचा नहीं पा रहे हैं। इधर रिज़वान उर रहमान को आज 19 साल बाद भी इंसाफ नहीं मिल पाया है। गायक और पूर्व सांसद कबीर सुमन ने 2008 में एक प्रोटेस्ट गाना बनाया। नाम था रिजवानूर बत्तो। उधर प्रियंका अपने परिवार के साथ रहती हैं और कई बार पब्लिक प्रोग्राम्स में देखी गई। अवार्ड फंक्शनंस में भी नजर आई और लक्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड के एडवरटाइजिंग डिपार्टमेंट की हेड भी बनी वो। हमने आपको एक शिकायत के बारे में बताया था जब प्रियंका और रिजवानों ने पुलिस से सिक्योरिटी मांगी थी। प्रियंका ने बाद में इसको लेकर एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि मेरा दिमाग उस वक्त काम नहीं कर रहा था। रिजवान ने जो मुझसे साइन करने को कहा मैंने कर दिया। मैंने उससे कहा था कि इस पूरे मामले में मेरे पापा को मत घसीटो। लेकिन उसने कहा कि पप्पू और रुकबान नूर ने चिट्ठी को ऐसे ही लिखने को कहा था और वह हमसे ज्यादा जानते हैं। 

     इस बयान ने काफी सवाल खड़े कर दिए। पप्पू यानी सैयद मोइनुद्दीन रहमान परिवार का पुराना जानने वाला और रुकबान नूर रहमान यानी रिजवान नूर का सगा बड़ा भाई। सवाल यह है कि क्या रिजवान नूर के अपने ही घर में कोई उसके खिलाफ था? रुकबानूर ममता बनर्जी की पार्टी के नेता हैं और ममता हर ईद पर रिजवानूर के घर जाती हैं। रुकबानूर तृणमूल कांग्रेस के तीन बार के एमएलए हैं। नादिया जिले की छपरा सीट से। 2011 में ममता ने उन्हें पहली बार टिकट दिया था और इधर अशोक तोड़ी और बाकी आरोपी बेल पर हैं। 2011 में चार्जेस फ्रेम हुए और 2017 में हाई कोर्ट ने चार्जेस क्वैश करने से मना किया। फिर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रायल रोकने से मना किया। लेकिन अब तक ट्रायल खत्म नहीं हुए हैं। यानी कोई फाइनल वर्डिक्ट नहीं। अब आखिर में हम एक सवाल छोड़कर जाएंगे कि क्या रिजवानूर को किसी ने मारा? क्या एक ऐसी व्यवस्था जहां पैसा, ताकत और धर्म मिलकर किसी की मोहब्बत को कुचल सकते हैं? जहां जांच अधिकारी खुद मर जाता है और उसके सिम कार्ड्स गायब हो जाते हैं। जहां एक बेटे की लाश के बाद मां को वकील के जरिए चिट्ठी आती है कि कपड़े वापस कर दो और जहां चार्जशीट दाखिल होती है और सुप्रीम कोर्ट में रुक जाती है। जहां आरोपी याचिका दाखिल करते हैं और मामला लटक जाता है। और अभी भी रिजवानूर की कहानी तो नहीं खत्म हुई बस रिजवानूर खत्म हो गया। 


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यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध समाचार रिपोर्टों, मीडिया कवरेज और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। इस लेख का उद्देश्य केवल एक चर्चित मामले की जानकारी देना और घटनाओं को समझाना है। इसमें प्रस्तुत विचार और विवरण किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय की छवि को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं हैं। मामले से संबंधित कई पहलू अभी भी कानूनी प्रक्रिया और विभिन्न दृष्टिकोणों के अधीन रहे हैं, इसलिए पाठकों से अनुरोध है कि इसे एक जानकारीपूर्ण लेख के रूप में ही देखें।

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